GANESH TEWARI 'NESH' (NASH) stories download free PDF

सच्ची मित्रता

by GANESH TEWARI 'NESH' (NASH)
  • 57

ऋगुवेद सूक्ति--(१५) की व्याख्यातवेद्धि सख्यम् स्तृतम्। १/१५/५भावार्थ -प्रभो ! आपकी ही मैत्री सच्ची है।पद-विश्लेषण--तव = तेरा / आपकाएव इद्धि ...

उदार जीवन

by GANESH TEWARI 'NESH' (NASH)
  • 258

ऋगुवेद सूक्ति-(१६)-की व्याख्या"मान्तः स्थूर्नो अरातयः" — १०/५७/१भावार्थ --हमारे अन्दर कंजूसी न हो।पद विच्छेद --मान्तः — भीतर, अन्तर मेंस्थूः/स्थुर्नः — ...

दान देने से धन नहीं घटता

by GANESH TEWARI 'NESH' (NASH)
  • 327

ऋगुवेद सूक्त.(१७) की व्याख्यामन्त्र — ऋग्वेद १०/११७/१उतो रयिः पृणतो नो पदस्यति।भावार्थ -दान करने वाले का धन नहीं घटता।पदच्छेद--उत + ...

जुआ मत खेलो

by GANESH TEWARI 'NESH' (NASH)
  • 414

ऋगुवेद सूक्ति-- (18) की व्याख्या"अक्षैर्मा दीव्य: कृषिमित् कृषस्व" 10/34/13भावार्थ--जुआ मत‌ खेलो, खेती करो।ऋग्वेद का यह मन्त्र द्यूत (जुआ)के दुष्परिणामों ...

जुआरी का पतन

by GANESH TEWARI 'NESH' (NASH)
  • 297

ऋगुवेद सूक्ति-(१९) की व्याख्या-“जाया तप्यते कितवस्य हीना”भावार्थ --जुआरी की पत्नी दीन हीन होकर दुख पाती है।ऋग्वेद १०.३४.१० (अक्षसूक्त)यह मंत्र ...

आत्मजागृति

by GANESH TEWARI 'NESH' (NASH)
  • 381

ऋगुवेद सूक्ति--(२०) की व्याख्या"कृत्वा चेतिष्ठो विश्वार्म्भूत"" १/६५/५भावार्थ --पदच्छेद (संकेतात्मक)कृत्वा । चेतिष्ठः । विश्वम् । अर्मभूत् (अर्म = स्नेह/हित)भावार्थ--प्रात: जागने ...

आलस्य मत‌ करो

by GANESH TEWARI 'NESH' (NASH)
  • 609

ऋगुवेद सूक्ति--(21) की व्याख्याऋगुवेद--"मा स्रेधत"--7/32/9अर्थ---आलस्य मत‌ करो।ऋग्वेद में प्रयुक्त — “मा स्रेधत” का भावार्थ है:“शिथिल मत पड़ो, आलस्य मत ...

सत्य का प्रकाश

by GANESH TEWARI 'NESH' (NASH)
  • 810

ऋगुवेद सूक्ति-(२२) की व्याख्यात्वं ज्योतिषा वितमोववर्थ--ऋगुवेद,--१/११/२२भावार्थ --हे प्रभु!अपने ज्ञान के प्रकाश से हमारे अज्ञान को नष्ट करो।मंत्र —“त्वं ज्योतिषा ...

ईश्वर की कृपा

by GANESH TEWARI 'NESH' (NASH)
  • 765

ऋगुवेद सूक्ति--(२३) की व्याख्यामंत्र — ऋग्वेद १/१०४/९“पितेव नः शृणुहि हूयमानः …”पदच्छेद--पितेव — नः — शृणुहि — हूयमानःशाब्दिक अर्थ--पितेव = ...

ईश्वर से मित्रता

by GANESH TEWARI 'NESH' (NASH)
  • 444

ऋगुवेद सूक्ति-- (२४) की व्याख्या“अघृणे न ते सख्याय पह्युवे” — ऋगुवेद _१/१३८/४भावार्थ --हे प्रभु ! मैं‌तेरी मित्रता से इन्कार ...